Wednesday, October 19, 2011

मौत की प्लानिंग जरूरी है, इसका कारण जानकर आप भौचक्के रह जाएंगे!

यद्यपि आधुनिक विज्ञान जीवन को किसी भी कीमत पर आगे बढाने की दिशा में काम कर रहा है,लेकिन मेडिकल जर्नल आस्ट्रेलिया में प्रकाशित सम्पादकीय के अनुसार हमें जीवन को आगे बढाने के अलावा अच्छी मृत्यु के लिए एक पूर्व  योजना बनाने की भी आवश्यकता है यह बात सुनने और समझने में अजीब सी लगती हो, पर अगर आप अगर जऱा सोचें तो इस बात में दम है। सघन चिकित्सा यूनिट में काम करने वाले चिकित्सक विलियम सिल्वेस्टर तथा श्वास रोग  चिकित्सक केरेन डेटरिंग का कहना है, कि मृत्यु से पूर्व रोगी की इच्छा एवं केयर प्रोग्राम पर और अधिक काम किये जाने की आवश्यकता  है।
इस जर्नल में छपे सम्पादकीय के अनुसार हम चिकित्सक  रोगी के हित में अंतिम सांस तक अपना फर्ज निभाते हैं, पर कई बार रोगी की इच्छा और चाह  को अंतिम समय में नहीं जान पाते हैं अत: इस बात की आवश्यकता है, कि रोगी से समय- समय पर उसे दी जा रही चिकित्सा के बारे में पूर्ण अवगत कराया जाय तथा उसके  नैतिक,धार्मिक ,आध्यात्मिक  मूल्यों  के प्रति अपनी सोच एवं इच्छा को  अकस्मात् गंभीर  होने की दशा से पूर्व ही जान लिया जाय ढ्ढ ऐसा देखा गया है, कि अधिकांश रोगी मृत्यु से पूर्व अपनी इन इच्छाओं को व्यक्त ही नहीं कर पाते हैं। मेडिकल जर्नल आस्ट्रेलिया में छपे ब्रायन ले एवं मिसेल चेपमेन के  एक अन्य लेख के अनुसार, क्या हममें से अधिकांश अपने  जीवन के अंतिम क्षणों के बारे में पूर्व में ही निर्णय लेने में सक्षम होते हैं?
चिकित्सा  का प्राचीन ग्रन्थ आयुर्वेद भी सुखायु की  कल्पना करता है,जिसमें जीवन की अवधि को सुखपूर्वक बिताकर अच्छी मृत्यु प्राप्त करने को शुभ माना गया है I आयुर्वेद में पूर्व जन्म एवं पुनर्जन्म की ओर भी इंगित किया गया है। अच्छी मृत्यु  को हमारे शास्त्रों में आवश्यक बताया गया है I  चिकित्सकों के लिए यह बात महत्वपूर्ण इसलिए हो जाती है ,क्योंकि वे अक्सर मृत्यु को अपने सामने देखते हैं। अत: मृत्यु एक अटूट सत्य है ,और इसे भी अच्छी तरह अपनी इच्छाओं को अंतिम समय में व्यक्त कर ही दुनिया से विदा लेने की दिशा में भी थोड़ा बहुत नियोजन किया जाना चाहिए। इसी आर्टिकल को पढ़ने के लिए दिए गए लिंक पर क्लिक करें :
http://religion.bhaskar.com/article/yoga-death-death-knowing-you-will-be-shocked-2509349.html

डांस का मैजिक: कर दें इन दो घातक बीमारियों की छुट्टी


हमारी संस्कृति में नृत्य का अपना महत्व है नाचने का  महत्व नाच न जाने आंगन टेढा मुहावरे से भी झलकता है ,अब यही बात अमेरीकी वैज्ञानिकों ने साबित कर दी है ,आप शुरू करें नाचना और पाएं मोटापे एवं टायप-2 डायबीटीज  से छुट्टी। वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष लगातार बच्चों को एक महीने तक, एक घंटे का साप्ताहिक हिप-होप नृत्य, एक जिम की वूडन फर्श पर कराकर पाया है । पेनीसाल्वेनिया स्कूल ऑफ नर्सिंग के डॉ. पेरी लीपमेन का कहना है, कि़ इस शोध से उन बच्चों को अलग कर दिया गया, जिनकी ह्रदय गति असामान्य रूप से बढ़ गयी थी।डॉ. लीपमेन का कहना है, कि़ यह शोध अच्छे  स्वास्थ्य के लिए पूरी दुनिया में नृत्य को बढ़ावा देगा।वैसे भी भारत में नृत्यों  की परम्परा संस्कृति से जुडी हुई है, कत्थक,कुचीपुडी ,ओडीसी ,भरतनाट्यम,भांगड़ा  आदि नृत्यों से होने वाली शारीरिक सक्रियता के कारण फायदे को देखकर ही इसे परम्परा के रूप में निभाया जा रहा है। शारीरिक सक्रियता के महत्व को योग के आसनों में भी देखा जा सकता है ,जो बात आज अमेरिकी शोधवेत्ता कह रहे हैं वो हमने सदियों से संस्कार के रूप में  अपनाई है। शायद हमारे ऋषियों के ज्ञान चक्षुओं क़ी दिव्यता का कमाल ही रहा होगा कि हम त्योहारों से लेकर शादियों में डांस करते रहे हैं, तो हो  जाएं। शुरू आज और अभी से ही नृत्य के अभ्यास में, इससे मिलेगा आपकी कला को निखार और उत्तम स्वास्थ्य रहेगा बरकरार।
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Sunday, October 16, 2011

सांप नवविवाहिता पति को डसने ही जा रहा था मगर तभी ....

अब दिवाली आने ही वाली है और इसे पूर्व धनतेरस के लिए बाजारों में खरीदारी करने क़ी भीड़ उमडऩा एक सामान्य बात है। वैसे भी धनतेरस पांच दिन चलनेवाले दीपावली के त्योहार का पहला दिन होता है,जिसे धनत्रयोदशी या धन्वन्तरीत्रयोदशी के नाम से जाना जाता है, जो कृष्णपक्ष क़ी त्रयोदशी को आश्विन महीने में पड़ता है। धनतेरस में आनेवाला शब्द 'धन समृद्धि का प्रतीक है और इस दिन देवी लक्ष्मी के वाहन उल्लू को धन, धान्य  एवं समृद्धि के लिए पूजने का विधान है। हिन्दू धर्मावलम्बी इस दिन को सोने एवं चांदी क़ी खरीददारी के लिए उपयुक्त मानते हैं। ऐसा माना जाता है कि़ क्रय किया नया धन शुभ फल देने वाला होता है। इस पर्व को मनाने के पीछे क़ी कथा आपको शायद ही मालूम हो तो हम बताते हैं इसके पीछे क़ी घटना। राजा हिम के सोलह वर्ष के बालक क़ी कुण्डली में विवाह के चौथे दिन सांप के काटने से मृत्यु होने का अंदेशा था, इसलिए विवाह के चौथे दिन उसकी नवविवाहित पत्नी ने मृत्यु के भय से उसे सोने नहीं दिया।
उसने सोने एवं चांदी के गहनों से सजाकर उस कमरे को रोशनियों से सराबोर कर दिया, अपने पति को जगाने के लिए वह कहानियां सुनाने एवं गीत गाने लगी। कहा जाता है कि़ सर्प के रूप में जब यम उस कमरे में दाखिल हुए तो उनकी आंखें कमरे क़ी जगमागाती रोशनियों को नहीं झेल पायी और वे अंधे हो गए तथा उस कमरे में प्रवेश नहीं कर पाए। इसके बाद वे पूरी रात उन सोने चांदी के सिक्कों एवं गहनों के ढेर के ऊपर बैठ रहे और उसकी पत्नी द्वारा गाया जा रहा मधुर संगीत सुनते रहे, अगली सुबह यम चुपचाप कमरे से बाहर निकल गए। इस प्रकार नवविवाहिता पत्नी ने अपने पति के प्राणों को यम के हाथों ले जाए जाने से रोकने में सफलता पा ली थी। कहा जाता है, कि उसी दिन से इस दिन को यमदीपन क़ी संज्ञा दी गयी और पूरी रात जगमगाते प्रकाश से यम के रूप में आनेवाली मृत्यु को दूर रखने क़ी परम्परा विकसित हुई।
एक दूसरी कहानी भी इस दिन के महत्व को बढ़ा देती है, कहा जाता है कि़ देवताओं एवं असुरों के बीच अमृत को लेकर जब युद्ध हो रहा था और इनके द्वारा जब समुद्र का मंथन किया गया तो भगवान् विष्णु के अवतार धन्वन्तरी अमृत कलश लेकर प्रकट हुए जिन्होंने देवताओं को अमृत का पान करा अमर बनाया, अत: चिकित्सक रोगमुक्त करने एवं औषधियों में अमृत तुल्य गुणों की प्राप्ति  हेतु भगवान् के रूप में पूजते हैं ताकि उनकी चिकित्सा सफल हो और प्राणियों के दुखों का नाश हो।इसी आर्टिकल को पदाहने के लिए दिए गए लिंक पर क्लिक करें :http://religion.bhaskar.com/article/yoga-husband-was-going-to-bite-the-snake-but-when-2494253.html

दीपावली पर खाने-खिलाने में इन बातों को ना भूले वरना....


दीपावली का त्योहार आने वाला है ,इस त्योहार में प्रकाश की जगमगाहट के साथ साथ मीठी -मीठी मिठाइयों एवं पकवानों को खाने एवं खिलाने का चलन भी है। यह ठीक है, कि मिठास हमारे जीवन क़ी आवश्यकता है ,यह वाणी सहित हमारे व्यवहार में हो तो क्या कहने। लेकिन यही मिठास यदि रक्त की शर्करा में बढ़ोतरी के रूप में हो, तो डायबिटीज को निमंत्रण देती है  और यह तो आप जानते ही होंगे कि़ डायाबिटीज  एक ऐसा  डिसऑर्डर है ,जो कई बीमारियों का कारण बन जाता है।
कहते हैं,कि़ "अति सर्वत्र वज्र्यते" यह बात खाने- खिलाने में भी शत-प्रतिशत लागू होती है। जैसे कविताओं में मधुर रस क़ी महत्वपूर्ण भूमिका है, वैसे ही आयुर्वेद में मधुर रस को बड़ा ही महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है,इसे कफ दोष को बढाने वाला माना जाता है और इसके विपरीत गुणों वाला रस कटु रस माना गया है। वैसे भी मधुरता के उलट कटुता होती है। लेकिन त्योहारों में कटुता हमारे संस्कारों के विपरीत है, संभवत: इसलिए ही तीज-त्योहारों में आपसी  मधुरता और भाईचारा बढाने के लिए मीठी-मीठी मिठाइयों एवं पकवानों को खाने एवं खिलाने का चलन है ,अत: हमें सयंमित होकर ही इनका सेवन करना चाहिए। ऐसी कुछ स्थितियां हैं जहां इनका सेवन न हो तो बेहतर है:-
-टाइप 1 या टाइप 2 डायाबिटीज के रोगी अतिरिक्त मीठे के सेवन से बचें तथा आहार में कटु-तिक्त एवं कसाय रस का सेवन अधिक करें। अगर स्वाद के कारण  मीठा खाने की इच्छा हो तो शुगर फ्री का सेवन करें बाजारों में आजकल स्टीविया पादप से बने शुगर फ्री उपलब्ध हैं, अगर आप चाय पीने के शौकीन हैं, तो यथा संभव शुगर फ्री डालकर ग्रीन-टी का सेवन करें।
-त्योहारों में तले हुए पकवान जैसे मालपुवा आदि में अत्यधिक गरिस्टता हमारी पाचन क्षमता को प्रभावित कर सकती है ,अत: इनका सेवन कम से कम ही करें तो बेहतर होगा ,खासकर हृदय एवं उच्च रक्तचाप के रोगी इनके सेवन से बचें।
-मिठाइयों में पडऩे वाले मावे की शुद्धता की जांच-परख कर लें, कहीं यह आपके लिए नुकसानदायक न हो। अत: मिठास हमारे त्योहारों ही नहीं बल्कि सामान्य  जीवन की एक दैनिक आवश्यकता है ,बस ध्यान रहे की यह शुद्ध एवं संयमित हो।
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त्योहारों का पर्यावरण रक्षा सहित औषधीय महत्व


कहते हैं,अच्छा खाना,अच्छा पहनना, अच्छी नींद और खुश रहने के बहाने ढूढना  जीवन को खुशनुमा और सफल बनाने का एक जरिया है I हमारी परम्परा में त्योहारों को मनाने के पीछे भी यही सोच काम करती है I त्योहारों में अक्सर रिश्तेदारों,दोस्तों से मुलाक़ात हो ही जाती है,कभी-कभी तो पुराने गिले-शिकवे दूर कर रिश्तों क़ी कडवाहट मिठास में बदल जाती है I दीपावली के त्योहार को मनाने के पीछे भी जीवन को अन्धकार से मुक्त कर ज्योति स्वरुप प्रकाश क़ी तरह धन -धान्य एवं समृद्धि से चमकने क़ी ईश्वर  से कामना करना है I दीपावली से पूर्व घरों क़ी साफ़-सफाई के पीछे भी स्वच्क्षता का सन्देश है, जिससे पूरा घर विसंक्रमित हो जाता है I इसी प्रकार पूजा में प्रयुक्त होनेवाली हवन सामग्री के घटक जीवाणुओं एवं विषाणुओं  को दूर करने में मददगार होते हैं I पूजा में चढ़ाया जानेवाला नारियल,आम के पत्ते,बिल्व  के पत्ते  ,तुलसी के पत्ते ,पंचगव्य ,पंचामृत हर एक का अपना औषधीय महत्व आयुर्वेद क़ी पुस्तकों में विस्तार से बताया गया है I इसके पीछे का उद्देश्य लोगों क़ी आस्था को प्रकृति से जोड़कर पर्यावरण रक्षा का सन्देश देना है I हमारे देश में हर त्योहार को बड़े ही धूम धाम से मनाये  जाने क़ी परम्परा है, इन्ही परम्पराओं में हमने कुछ ऐसे साधन भी विकसित कर लिए हैं, जो हमारे लिए शारीरिक ,मानसिक एवं आर्थिक नुकसान दे सकते हैं, शराब एवं जुआ इनमें से एक है ,अतः आवश्यकता है क़ि त्योहारों में शालीनता  एवं मर्यादा का पालन कर पर्यावरण  रक्षा का भाव अपने दिल में रखते हुए आतिशबाजी का प्रयोग करना स्वास्थ्य रक्षा के  लिए उपयोगी होगा I हमें अपनी खुशी के साथ साथ औरों क़ी खुशियों का भी ख़याल रखना चाहिए I

भारत का सुपर बग


भारत में मिलने वाले "सुपर बग" जिससे पश्चिमी देश भयाक्रांत हैं, दरअसल जीवाणुओं में मिलनेवाला NDM-1 नामक एक "सुपर जीन" है ,जिसे ' न्यू देल्ही-मेटेलो -बीटा-लेक्टेमेज 'नाम दिया गया हैIआज इस सुपर बग से पूरा पश्चिमी जगत डरा है Iइससे भारत के मेडिकल टूरिज्म उद्योगके प्रभावित होने का पूरा ख़तरा हैI भारत में प्रतिवर्ष एक लाख से अधिक लोग विदेशों से स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लेते हैं, तथा 
२०१२ तक इस उद्योग के २ बिलियन डालर तक पहुचने की सभावना है I अतः इसके पीछे पश्चिमी देशों की  एक सोची समझी साजिश को नकारा नहीं जा सकता है,क्योंकि इस "सुपर बग" के सुपर जीन का नाम भारत की राजधानी से  जोड़ कर देने की पीछे के मकसद को समझना भी आवश्यक होगा Iयदि इसे सबसे पहले भारत में देखा गया इसलिए इसका नाम 'न्यू देल्ही-मेटेलो -बीटा-लेक्टेमेज'  दिया गया ,तो फिर HIV के विषाणु को सबसे पहले अमेरिका में देखा गया तो इसका नाम अमेरिकी शहर के नाम पर क्यों नहीं रखा गया ?
यह बात ठीक है की इन दवाओं का दुरुपयोग भी ऐसी स्थिति के लिए काफी हद तक जिम्मेदार है,लेकिन इस कुप्रचार में केवल भारत को शामिल करना पश्चिमी देशों की   नियत में संदेह पैदा करता हैI

महिलाएं कैसे मुकाबला करें उन असहज दिनों का?

स्त्री को हमारे समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है ,हो भी क्यों न ? कहीं मां,बहिन,बेटी ,बहु और पत्नी के रूप में उसकी सेवाएं हमारे जीवन के निर्माण से लेकर उन्नति के शिखर तक पहुंचाने में प्राप्त होती है। आयुर्वेद में भी स्त्री के महत्व क़ी महिमा बतायी गयी है, आप जानते हैं कि आज के युग में स्त्री पुरुषों के बराबरी पर खडी  है ,और कई मामलों में तो एक कदम आगे भी,जबकि शारीरिक रूप से पुरुषों एवं स्त्रियों में कुछ असमानताएं भी हैं ,खासकर जननागों क़ी असमानता।
ये असमानता महिलाओं क़ी शारीरिक,मानसिक एवं सामाजिक पहलूओं को थोड़ा बहुत तो प्रभावित तो करती ही हैं। इन बातों का एहसास उनके करीब जाकर ही होता है ,इसका कारण महिलाओं में नियमित होनेवाला  'मासिक- चक्र ' या माहवारी  है ,जो उन्हें हर महीने गर्भधारण के लिए योग्य बनाता है,आयुर्वेद में स्त्री की इस अवस्था को रज:स्वला अवस्था कहते हैं , इसके  प्रारम्भ होने क़ी उम्र 12 से 13 वर्ष होती है, जिसे 'मीनार्क कहा जाता है ,औसतन यह आठ से सोलह वर्ष के बीच हो सकता है,ठीक इसी प्रकार महिलाओं में इस चक्र के बंद होने क़ी आयु 45 से 55 वर्ष है, जिसे 'मेनोपोज़ ' कहा जाता है , अर्थात इस उम्र के बाद गर्भाधान क़ी प्रक्रिया नहीं हो सकती है ढ्ढ कुछ महिलाओं में यह 45 वर्ष से पूर्व भी हो सकती है ,इसे प्री- मेच्युर मेनोपोज़कहा जाता है।
 मासिक चक्र क़ी अवधि महिलाओं में अलग- अलग होती है, कुछ में यह छोटी अवधि का होता है, तो कुछ में लम्बी अवधि का,वैसे औसतन यह  21 से 35 दिनों के बीच होता है, इसके प्रारम्भ होने के पूर्व कुछ लक्षण आते हैं,जिन्हें 'प्री-मेंसटूरल लक्षण ' के नाम से जाना जाता है, इनमे सिरदर्द,कमरदर्द,पूरे शरीर में सामान्य पीड़ा खासकर पेट के निचले  हिस्से में तथा जोड़ों में दर्द ,स्तनों में असहजता का एहसास,पेट फूलना,कभी -कभी अँगुलियों,टखनों एवं पिंडलियों में पीड़ा क़ी अनुभूति होती है ढ्ढ   इसी प्रकार मूड में परिवर्तन,तनाव,चिडचिडापन,अवसाद ,किसी  काम में मन न लगना,भूलने क़ी प्रवृति,थकान आदि लक्षण देखे जाते हैं।  डॉ.केथेरिन डाल्टन ने महिलाओं के  'मासिक  -चक्र ' पर  एक लंबा शोध किया है तथा यह निष्कर्ष दिया है ,कि़ महिलाओं में आत्महत्या,क्राइम,शराब सेवन,दुर्घटना आदि मासिक- चक्र के प्रारम्भ होने के एक दिन पूर्व (पारामेंस्टूरम) अवधि में देखे जाते हैं, कुछ देशों में तो महिलाओं को इस अवधि में  टेम्पररी इन्सेनीटी नाम से कानूनी मान्यता मिली हुई है। यह बात सत्य है कि़ कुछ महिलाओं में ही ये लक्षण कठिनाई पैदा करते हैं तथा अधिकांश महिलाएं इसे हर माह उत्पन्न होने वाला एक सामान्य लक्षण मानकर अपने आप को संयत कर लेती हैं,लेकिन कुल मिलाकर इसका मानसिक प्रभाव तो पड़ता ही है।
ये तो रही इसके शारीरिक और मानसिक पहलूओं क़ी बात अब जानें कैसे इससे होनेवाली असहजता से जूझें :-
-यह कोई रोग की अवस्था नहीं है,अपितु महिलाओं के शरीर क़ी स्वाभाविक अवस्था है,अत: जबतक लक्षण कठिनाई उत्पन्न न करें तबतक दवाओं के अनावश्यक सेवन से बचें।
-अधिकांश महिलाओं को इसकी पूर्ण जानकारी ही नहीं होती है ,तथा शारीरिक स्थितियों के प्रति सहनशीलता का अभाव भी स्थिति को प्रभावित करता है,अर्थात अगर यह समझ में आ जाय कि़ सिरदर्द,कमरदर्द,चिडचिडापन आदि लक्षण 'मासिक -चक्र ' के कारण उत्पन्न हो रहे हैं तथा यह किसी अन्य बीमारी के कारण नहीं तो समस्या काफी हद तक कम हो जाती है।
-अगर महिलाएं अपनी 'मेंसटूरल-प्रोफाइल ' क़ी ठीक- ठीक  जानकारी रखें ,तो सकारात्मक सोच से भी अपने व्यवहार को संयमित किया जा सकता है।
-यदि शरीर में पानी के रूकने के कारण सूजन आदि जैसे लक्षण आ रहे हों तो , 'पारामेंस्टूरम अवधिÓ में नमक और पानी की मात्रा थोड़ा कम कर दें ,इसके साथ ही ऐसे फलों का सेवन करें जो प्राकृतिक रूप से मूत्रल ( डाईयूरेटिक) होते हैं  जैसे :खीरा,ककडी,लौकी,तरबूज आदि ढ्ढ
-भोजन में अतिरिक्त नमक क़ी मात्रा को कम करते हुए पोटेशियम बहुल फल जैसे: केला,संतरे एवं टमाटर का सेवन करें ढ्ढ
-यह बात सत्य है कि़ हम क्या  आहार लेते हैं, इसका सीधा सम्बन्ध हमारे शारीरिक लक्षणों पर पड़ता है,अत: सन्तुलित आहार एवं प्रचुर मात्रा में फल सब्जियों का प्रयोग कब्ज जैसे लक्षणों को दूर करता है।
-आयुर्वेद में भी स्त्री को रज:स्वला की अवस्था में विशेष सावधानी एवं सफाई तथा सदाचार का पालन करने तथा पुरुषों को इस अवस्था में यौन सम्बन्ध स्थापित  न करने का निर्देश दिया गया है।
-कुछ आयुर्वेदिक दवाएं जैसे :गोक्षुरचूर्ण,पुष्यानुगचूर्ण,दशमूलारिष्ट,पुष्करमूलचूर्ण ,लोध्रचूर्ण,नवायस लौह,धात्रीलौह,मंडूरभस्म,सुपारीपाक   आदि का चिकित्सक के निर्देशन  में प्रयोग इसके सामान्य लक्षणों को तो कम करता ही  है,साथ ही मानसिक एवं शारीरिक रूप से संबल बनाता है।
-योग के आसनों एवं प्राणायाम का नियमित अभ्यास तनाव को दूर कर मानसिक मजबूती प्रदान करता है।
अत: हर स्त्री को महीने के उन दिनों में सामान्य एवं संयत भोजन ,सदवृत्त पालन के साथ- साथ सफाई का विशेष खय़ाल रखते हुए ,सामान्य लक्षणों के प्रति सामान्य व्यवहार एवं असामान्य लक्षणों के होने पर प्राकृतिक औषधियों से उपचार लेना चाहिए।इसी आर्टिकल को पढने के लिए दिए गए लिंक पर क्लिक करें :
http://religion.bhaskar.com/article/yoga-how-do-women-cope-with-the-uncomfortable-days-2388150.html